दशहरा

  असत्य पर सत्य की जीत का पर्व.                           दशहरा 
दशहरा का त्योहार असत्य पर सत्य ओर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाते हैं। इस दिन देशभर में रावण दहन का आयोजन होता है। रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। लंका के राजा रावण को हम बुराई का प्रतीक मानते हैं, उसके जीवन सॆ जुड़ी ऐसी कई बाते हैं जिसके बारे में जानना काफी रोचक है।

 दशानन रावण

कहा जाता है कि रावण के 10 सिर थे, हर सिर के अलग अलग ​अ​र्थ थे। रावण को दशानन भी कहा जाता है दशानन का अर्थ है- जिसके 10 सिर हों। कहा जाता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने वर्षों तक कठोर तप किया लेकिन भगवान शिव प्रसन्न नहीं हुए। इसके बाद रावण ने भगवान शिव को अपना सिर अर्पित करने का निर्णय लिया। भगवान शिव की भक्ति में लीन रावण ने अपना सिर काटकर भोलेनाथ को अर्पित कर दिया, लेकिन उसकी मृत्यु नहीं हुई। उसकी जगह दूसरा सिर आ गया। ऐसे एक-एक करके रावण ने अपने 9 सिर भगवान शिव को ​अर्पित कर दिए। जब 10वीं बार उसने अपना सिर भगवान को अर्पित करना चाहता तभी भगवान शिव वहां प्रकट हो गए। वे रावण की भक्ति से काफी प्रसन्न हुए। इसलिए रावण को भगवान शिव का परम भक्त कहा जाता है।

रावण विद्वान भी था 

कुछ लोग ये भी मानते हैं कि रावण बहुत विद्वान था, उसे 6 दर्शन और 4 वेद कंठस्थ थे, इसलिए उसका नाम दसकंठी भी था। बाद दसकंठी को ही लोगों ने दस सिर मान लिया।

दशमी  को हुआ था रावण वध

रामचरितमानस में भी दशानन की चर्चा है। बताया जाता है कि वह भगवान राम से युद्ध के लिए आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को निकला था, हर दिन उसका एक सिर कट जाता था। 10वें दिन यानी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को उसका वध हुआ। इस वजह से ही दशमी के दिन रावण दहन होता है और दशहरा मनाते हैं।

दशहरा (विजयादशमी ) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है !

इस दिन लोग शस्त्र-पूजा करते हैं और नया कार्य प्रारम्भ करते हैं! विश्वास है कि इस दिन जो कार्य आरम्भ किया जाता है उसमें विजय मिलती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा 

दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।

इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर भी 'विजयादशमी' कहते हैं। इस दिन भगवान रामचंद्र चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुँचे थे। इसलिए भी इस पर्व को 'विजयादशमी' कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।

ऐसा माना गया है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए। इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग और भी अधिक शुभ माना गया है। युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं (महत्त्वपूर्ण पदों पर पदासीन लोग) को सीमा का उल्लंघन करना चाहिए। दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के यहँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र उत्तर ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है।

देश -विदेश मे कई जगह होती है रावण की पूजा 

देश विदेश में अनेको स्थानो पर रावण की पूजा की जाती हैं उसी प्रकार प्रदेश में भी कई स्थानो पर रावण की पूजा की जाती है जिनमे  मुख्य है मंदसौर शहर जहा रावण की पूजा की जाती है. पुराने वक्त में मंदसौर को दशपुर कहा जाता था और पौराणिक मानय्ताओं के अनुसार मंदसौर रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका था जिस वजह से वहां के लोग उन्हें अपना दामाद मनाते हैं. इस दिन भले ही भारत के कई जगहों पर रावण का पुतला जलाया जाता हो लेकिन मंदसौर में साल भर रावण की पूजा की जाती है.

इसी प्रकार उज्जैन जिले से 20 किलोमीटर दूर बड़नगर तहसील के गांव चिकली में भी रावण की पूजा की जाती है। यहां कई साल पुरानी रावण की प्रतिमा स्थापित है। 

वर्तमान समय मे प्रत्येक व्यक्ति में रावण से भी बुरी ओर भयानक बुराईया भरी पड़ी हैं लेकिन आज हम अपनी बुराईयो को न देखकर हर वर्ष रावण के पुतले को जलाकर अपनी बुराईयो को नजर अंदाज कर जाते हैं! 





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