नवरात्रि

     
                    जय माता दी।।

ज  -  - -जब भी कोई माँ के दर पर जाता है, 
- -  - यम के भय से मुक्त हो जाता है, 
मा - - - माँ तू ही कष्ट निवारिणी है ,
ता - - - तारण हारिणी तू है,तु ही बिगड़ी बनाती  दी - - - दिया है तूने सब कुछ बिन मांगे माँ।। 

  नवरात्रि का महत्व

हिंदू धर्म में नवरात्रि एक साल में चार बार आते हैं लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है. ​हिंदू नववर्षक की शुरुआत चैत्र नवरात्रि से मानी जाती है. वहीं शारदीय नवरात्रि का भी अलग महत्व है. कहा जाता है कि शारदीय नवरात्रि धर्म की अधर्म पर और सत्य की असत्य पर जीत का प्रतीक है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर आती है और धरती को उनका मायका कहा जाता है. उनके आने की खुशी में इन दिनों को दुर्गा उत्सव के तौर पर देशभर में धूमधाम से सेलिब्रेट किया जाता है. श्रध्दालु पहले दिन कलश स्थापना कर इन नौ दिनों तक व्रत-उपवास करते हैं.!

नवरात्रि में नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की अराधना की जाती है.
हिंदू कैलेंडर के मुताबिक शारदीय नवरात्रि हर साल शरद ऋतु में अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होते हैं और इसका विशेष महत्व है. ! नौ दिनों तक भक्त मां के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और मां को प्रसन्न करने के लिए व्रत भी किया जाता है. मान्यता है कि नौ दिनों तक भक्तिभाव से मां दुर्गा की पूजा करने से वह प्रसन्न होकर भक्तों के सभी कष्ट हर लेती हैं. नवरात्रि के पहले दिन मंदिर साफ करके वहां कलश स्थापना की जाती है. लेकिन क्या आप जानते है ​कि नवरात्रि क्यों मनाए जाते हैं और इसका क्या महत्व है.

नवरात्रि की पौराणिक कथा

नवरात्रि मनाए जाने को लेकर दो पौराणिक कथाएं प्रचलित है. पहली कथा के अनुसार महिषासुर नामक एक राक्षक ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर उनसे वरदाना मांगा था कि दुनिया में कोई भी देव, दानव या धरती पर रहने वाला मनुष्य उसका वध न कर सके. इस वरदान को पाने के ​बाद महिषासुर आतंक मचाने लगा. उसके आतंक को रोकने के लिए शक्ति के रुप में मां दुर्गा का जन्म हुआ. मां दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक युद्ध चला और दसवें दिन मां ने महिषासुर का वध कर दिया.

दूसरी कथा के अनुसार जब भगवान राम लंका पर आक्रमण करने जा रहे थे तो उससे पहले उन्होंने मां भगवती की अराधनी की. भगवान राम ने नौ दिनों तक रामेश्वर में माता का पूजन किया और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां ने उन्हें जीत का आर्शीवाद दिया. दसवें दिन राम जी ने रावण को हराकर लंका  पर विजय प्राप्त की थी. तभी से  विजयदशमी (दशहरा) का त्योहार मनाया जाता हॆ! 

भागवत पुराण में 108, कालिका पुराण में 26 , शिवचरित्र में 51, दुर्गा सप्तशती और तंत्र चूड़ामणि में शक्तिपीठों की संख्या 52 बताई गई है। आमतौर पर 51 शक्तिपीठ माने जाते हैं।

मैरी जन्म स्थली बड़नगर का माता का अति प्राचीन किला 


उज्जैन से करीब 50 किमी दूर बड़नगर नगर में धर्म का अनोखा संगम नजर आता है। यहां बने प्राचीन किले में नागणेचा माता का मंदिर है और सामने ही चांदशाह वली बाबा की दरगाह। यहां बिना किसी विवाद के दोनों धर्मों के लोग पहुंचते हैं। साथ में दर्शन करते हैं। नवरात्रि में आकर्षक रोशनी से जगमग मंदिर के साथ ही दरगाह भी रोशन की जाती है । जानकार बताते हैं 15वीं शताब्दी में मालवा के सुल्तान मेहमूद खिलजी से जागीर में प्राप्त "नौलाई "(बड़नगर का प्राचीन नाम)  वरसिंह ने इस किले का निर्माण करवाकर उसमें अपनी कुलदेवी नागणेचा माता की प्राण-प्रतिष्ठा कराई थी। रेलवे स्टेशन के निकट स्थित किले में शारदीय नवरात्रि में हर साल नौ दिनों तक मेला लगता है।
किले पर स्थित मां नागणेचा माता मंदिर पर लगने वाले नवरात्रि मेले की परंपरा पुरानी है। नगर पालिका सीमा में स्थित होने के कारण किले की व्यवस्था नगर पालिका परिषद द्वारा की जाती है। नौ दिनी मेला उत्सव में विभिन्न सांस्कृतिक, साहित्यिक, धार्मिक व खेलकूद गतिविधियां आयोजित की जाती है।

किले का भव्य  प्रवेश द्वार 

नगर में कई रूप में विराजमान हैं माता, जगह-जगह है मंदिर

नागणेचा (कालिका) माता मंदिर के अलावा नगर में भगवती माता मंदिर, गजनीखेड़ी का मां चामुंडा माता मंदिर, रसूलाबाद टेकरी स्थित भवानी माता मंदिर हमारे अतीत के वैभव एवं आस्था के प्रतीक हैं।

बड़नगर के पश्चिम में नगर से कुछ दूर ऐतिहासिक महत्व वाला भगवती क्षेत्र है। यह वही क्षेत्र है जहां कभी प्राचीन बड़नगर (नौलाई) बसता था। मान्यता है कि चालुक्यों के आक्रमण के समय से वीरान हुए भगवती क्षेत्र में लगभग 300 वर्ष पूर्व 1700 ई. सन में स्वामी हीरानंद गिरि के समय में तेज वर्षा और आंधी के कारण वट (बरगद) वृक्ष के फटने पर उसमें से देवी मूर्ति प्रकट हुई। इसी कारण भगवती माता कहा जाता है।


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